अनजाना रिश्ता

Thursday, August 20, 2009
कद उसका ,
कुछ बहुत बड़ा न था
पर जिम्मेदारियों का बोझ
कहीं बड़ा उसके कंधे चढा था
याद है मुझे
लाल रंग का एक फटा सा कपड़ा
जो उसके कंधे पर पड़ा था
और उससे झांकती
एक नन्ही सी जान
था वो उसका भाई
उसकी आंखों में मैंने पढ़ा था
लू के थपेडे और धूप की तपिश
बर्दाश्त करती
जीने के लिए लड़ रही थी
एक गाड़ी से दूसरी तक
हाथ फैलाये विंनती कर रही थी
एक पायी तो कया
रोटी का एक टुकडा भी
नसीब न था
उसकी अरज को हर राहगीर ने
आगे बढ़ा दिया
भूख को जब
पानी से बुझाने की सोची
तो नलके के मालिक ने भी
उसे भगा दिया
सड़क के किनारे पड़े डिब्बे से
उसने कुछ निकाला
शायद कुछ खाने को था
पुरा या आधा निवाला
उसके हिस्से तो कुछ न आया
पुरा ही अपने भाई को खिलाया
सिग्नल हुआ और ड्राईवर ने
गाड़ी को आगे बढाया

फ़िर उस रस्ते पर
कभी दिखे नहीं दोनों
न ही उनके बारे में
किसी ने जाना
अखबार में जब तस्वीर देखि
तब मैंने पहचाना
सड़क किनारे जो लावारिस पड़े थे
वही थे वो मासूम
जो किसी काली गाड़ी से
कुचले गए थे
ये मैंने तब क्यूँ न जाना
उनकी मौत पर,
न कोई रोया ,न चिल्लाया
यूँ ही गुमनाम सी ज़िन्दगी थी उनकी
और न जाने उन जैसे कितनों की
न ही जिनका कोई अपना
समझा सभी ने उन्हें पराया

अपनी ही ज़िन्दगी में मशरूफ
किसे फुर्सत है इतनी
किसी और के दर्द का
जो एहसास करे
उम्मीद करती हूँ
क़यामत से पहले हो ऐसी सुबह
जब इंसान ख़ुद से ज्यादा
इंसानियत से प्यार करे

3 comments:

  1. anuradha said...:

    wo raasta uska safar tha,aur shayad manzil.
    umeed hamara safar hai,aur shayad manzil.

  1. anushree said...:

    #anuradha:very well said dear
    thax for visiting the blog
    keep reading!!

  1. anushree said...:
    This comment has been removed by the author.